#यात्रा_वृतांत_भाग-1
#बांवरा_मन
इंसान जैसा सोचता है वैसा होता नहीं। सपने जो हम अपनी खुली आँखों से देखते हैं अक्सर उन्हें हक़ीक़ी ज़मीन मयस्सर नहीं होती।
अब देखिये न, मैं पठानकोट से बस में सवार हुआ था जहाँ से बस बनती है। मनचाही सीट पर बैठ गया, और अब शुरू हुआ मेरा इंतजार।
इंतजार यह कि मेरी बाजूवाली सीट पर आज तो पक्का कोई सुंदर कन्या एकदम टाइट कपड़े पहने हॉट अवतार लिये आयेगी और पूछेगी कि "हेल्लो क्या यह सीट खाली है?" और मैं बड़े ही अदब से खुद को कोने में सरकाकर सलीके से जवाब दूंगा "हाँ हाँ, बैठिये न खाली ही है।"
हुआ यह कि जब तक पूरी कि पूरी बस खाली थी तो हर चढ़ने वाला अलग ही सीट को प्रिफर कर रहा था, अब पर्वतीय क्षेत्र की यात्रा हो तो यूं भी सभी को खिड़की वाली सीट चाहिये न?
जब तकरीबन सभी खिड़की वाली सीटें भर चुकी तब मैं समझ गया कि आने वाली कुछ घड़ियाँ बड़ी ही इम्तिहान की घड़ियाँ रहने वाली हैं।
चलिये साहब हर स्टेशन पर मेरी बेचैनी और दिल की धड़कने तेज हो जाना स्वाभाविक थी खासकर तब जब चढ़ने वाली सवारी सहचरी हो और काफी फ्रैंक हो।
खैर जस्सुर स्टेशन पर एक विदेशी महिला यात्री चढ़ने को हुई, मैंने खुद को बड़ी हद तक एकदम कोने में सरका दिया था ताकि उस विदेशी ललना को लगे कि यहां से अधिक आरामदयाक सीट उसे और कहीं नहीं मिलने वाली।
हुआ भी यही, वो बस में चढ़ते ही आगे की तीन सीटों को नजरअंदाज करती हुई मेरी तरफ ही बढ़ चली थी...कि अचानक.....तभी मुझे पहली बार इस बात का अहसास हुआ कि यहां किस्मत की लड़ाई मैं अकेला ही नहीं लड़ रहा और भी कई बल्कि मुझसे भी ज्यादा समर्पित व जुझारू शह सवार अदृश्य रूप से इस किस्मत की आजमाईश में लगे हुए हैं।
उस सुंदर गोरी मेम ने जैसे ही तीसरी सीट पार की दूसरी नंबर की सीट वाला बंदा अपनी सीट से उठ खड़ा हुआ और उसे खिड़की वाली सीट का प्रलोभन दे डाला। अब इस प्रस्ताव को कोई कैसे टाले? मेम साब बड़ी ही तत्परता से मुस्कुराकर मुड़ी और जा बैठी उस खिड़की वाली सीट पर और उसके बैठते ही वो बंदा भी तपाक से उसके पास अपनी तशरीफ़ बाकायदा रख चुका था।
कुछ ही देर में उस सीट प्रस्तावक विशेषज्ञ ने उस गोरी मेम से दोस्ती भी कर ली थी और मुझे लग रहा था यह दोनों ही अकेले हैं तो आगे शायद साथ साथ ही घूमने का प्रस्ताव भी उनके बीच में जरूर चर्चा का विषय बनेगा और फिर यह दोनों ही साथ घूमेंगे-फिरेंगे, साथ खायेंगे-पियेंगे और सबसे बड़ी बात जो मुझे कचोट रही थी वो यह कि दोनों साथ ही एक ही रूम में भी रहेंगे।
हाय आशिकी की दुनिया का मैं कितना बेबस लाचार व फिसड्डी खिलाडी साबित हुआ और देखिये किस तरह यह पहाड़ी लड़का विदेशी बाला को ले उड़ा।
खैर आपकी हर गलती आपको एक नया पाठ पढ़ाती है, जो हो चुका उसे बदला नहीं जा सकता, बीता समय, कमान से निकला तीर कभी वापस नहीं आते यही सोचकर क्या हम प्रयास करना छोड़ दें?
कदापि नहीं।
मैं अब और अधिक सावधान और पहले से ज्यादा समर्पित भाव से बचे हुए प्रतियोगियों के साथ भाग्य की आजमाईश के अगले इम्तिहान की तयारी में जुट गया था। मैंने अपने वरिष्ठ प्रतियोगी से आज बहुत कुछ सीखा था और यही घाघपन और चतुरता मुझे अवश्य ही सफलता के सोपान पर ले जायेगी यह मेरी निजी सोच थी।
मैंने अपने बिखरे सपनो को इकठ्ठा किया, निराशा के भावों को स्वयं से दूर कर पूरे जोश व जूनून के साथ अब मैं पूरी मुस्तैदी से इंतजार करने लगा अगले स्टेशन का।
अगला स्टेशन था भदवार, जैसे ही यहां बस रुकी मैं सचेत हो गया। मैं सच में किस्मत का धनी था अब बस के बाहर जो लड़की खड़ी थी वो हर दृष्टी से उस गोरी मेम को मात दे रही थी। खुले लम्बे बाल, गेहुँवा रंग, आँखों में काजल, होठों पर हल्की लाली, गाल पर छोटा सा काला तिल, फ्लावर की डिजाइन वाला पटियाला सूट पहने चेहरे पर हल्की सी मुस्कान, हाय। सच में ये गोरियाँ हमारी भारतीय लड़कियों की सुंदरता के आगे ज़रा भी नहीं ठहरती।
खैर इस बार मैं कोई गलती नहीं करना चाहता था इसीलिये उसके बस में चढ़ने से पूर्व ही मैं पूर्णतः सावधान हो चूका था।
उसने पहला कदम बस में रखा तो गोया महसूस यूं हुआ कि मेरे धड़कते जिगर पे हाथ रख दिया हो, जैसे जैसे उसके कदम आगे बढ़ते जा रहे थे मेरी धड़कने तेज हुई जा रही थी......शेष वृतांत अगली पोस्ट में ।
#बांवरा_मन
इंसान जैसा सोचता है वैसा होता नहीं। सपने जो हम अपनी खुली आँखों से देखते हैं अक्सर उन्हें हक़ीक़ी ज़मीन मयस्सर नहीं होती।
अब देखिये न, मैं पठानकोट से बस में सवार हुआ था जहाँ से बस बनती है। मनचाही सीट पर बैठ गया, और अब शुरू हुआ मेरा इंतजार।
इंतजार यह कि मेरी बाजूवाली सीट पर आज तो पक्का कोई सुंदर कन्या एकदम टाइट कपड़े पहने हॉट अवतार लिये आयेगी और पूछेगी कि "हेल्लो क्या यह सीट खाली है?" और मैं बड़े ही अदब से खुद को कोने में सरकाकर सलीके से जवाब दूंगा "हाँ हाँ, बैठिये न खाली ही है।"
हुआ यह कि जब तक पूरी कि पूरी बस खाली थी तो हर चढ़ने वाला अलग ही सीट को प्रिफर कर रहा था, अब पर्वतीय क्षेत्र की यात्रा हो तो यूं भी सभी को खिड़की वाली सीट चाहिये न?
जब तकरीबन सभी खिड़की वाली सीटें भर चुकी तब मैं समझ गया कि आने वाली कुछ घड़ियाँ बड़ी ही इम्तिहान की घड़ियाँ रहने वाली हैं।
चलिये साहब हर स्टेशन पर मेरी बेचैनी और दिल की धड़कने तेज हो जाना स्वाभाविक थी खासकर तब जब चढ़ने वाली सवारी सहचरी हो और काफी फ्रैंक हो।
खैर जस्सुर स्टेशन पर एक विदेशी महिला यात्री चढ़ने को हुई, मैंने खुद को बड़ी हद तक एकदम कोने में सरका दिया था ताकि उस विदेशी ललना को लगे कि यहां से अधिक आरामदयाक सीट उसे और कहीं नहीं मिलने वाली।
हुआ भी यही, वो बस में चढ़ते ही आगे की तीन सीटों को नजरअंदाज करती हुई मेरी तरफ ही बढ़ चली थी...कि अचानक.....तभी मुझे पहली बार इस बात का अहसास हुआ कि यहां किस्मत की लड़ाई मैं अकेला ही नहीं लड़ रहा और भी कई बल्कि मुझसे भी ज्यादा समर्पित व जुझारू शह सवार अदृश्य रूप से इस किस्मत की आजमाईश में लगे हुए हैं।
उस सुंदर गोरी मेम ने जैसे ही तीसरी सीट पार की दूसरी नंबर की सीट वाला बंदा अपनी सीट से उठ खड़ा हुआ और उसे खिड़की वाली सीट का प्रलोभन दे डाला। अब इस प्रस्ताव को कोई कैसे टाले? मेम साब बड़ी ही तत्परता से मुस्कुराकर मुड़ी और जा बैठी उस खिड़की वाली सीट पर और उसके बैठते ही वो बंदा भी तपाक से उसके पास अपनी तशरीफ़ बाकायदा रख चुका था।
कुछ ही देर में उस सीट प्रस्तावक विशेषज्ञ ने उस गोरी मेम से दोस्ती भी कर ली थी और मुझे लग रहा था यह दोनों ही अकेले हैं तो आगे शायद साथ साथ ही घूमने का प्रस्ताव भी उनके बीच में जरूर चर्चा का विषय बनेगा और फिर यह दोनों ही साथ घूमेंगे-फिरेंगे, साथ खायेंगे-पियेंगे और सबसे बड़ी बात जो मुझे कचोट रही थी वो यह कि दोनों साथ ही एक ही रूम में भी रहेंगे।
हाय आशिकी की दुनिया का मैं कितना बेबस लाचार व फिसड्डी खिलाडी साबित हुआ और देखिये किस तरह यह पहाड़ी लड़का विदेशी बाला को ले उड़ा।
खैर आपकी हर गलती आपको एक नया पाठ पढ़ाती है, जो हो चुका उसे बदला नहीं जा सकता, बीता समय, कमान से निकला तीर कभी वापस नहीं आते यही सोचकर क्या हम प्रयास करना छोड़ दें?
कदापि नहीं।
मैं अब और अधिक सावधान और पहले से ज्यादा समर्पित भाव से बचे हुए प्रतियोगियों के साथ भाग्य की आजमाईश के अगले इम्तिहान की तयारी में जुट गया था। मैंने अपने वरिष्ठ प्रतियोगी से आज बहुत कुछ सीखा था और यही घाघपन और चतुरता मुझे अवश्य ही सफलता के सोपान पर ले जायेगी यह मेरी निजी सोच थी।
मैंने अपने बिखरे सपनो को इकठ्ठा किया, निराशा के भावों को स्वयं से दूर कर पूरे जोश व जूनून के साथ अब मैं पूरी मुस्तैदी से इंतजार करने लगा अगले स्टेशन का।
अगला स्टेशन था भदवार, जैसे ही यहां बस रुकी मैं सचेत हो गया। मैं सच में किस्मत का धनी था अब बस के बाहर जो लड़की खड़ी थी वो हर दृष्टी से उस गोरी मेम को मात दे रही थी। खुले लम्बे बाल, गेहुँवा रंग, आँखों में काजल, होठों पर हल्की लाली, गाल पर छोटा सा काला तिल, फ्लावर की डिजाइन वाला पटियाला सूट पहने चेहरे पर हल्की सी मुस्कान, हाय। सच में ये गोरियाँ हमारी भारतीय लड़कियों की सुंदरता के आगे ज़रा भी नहीं ठहरती।
खैर इस बार मैं कोई गलती नहीं करना चाहता था इसीलिये उसके बस में चढ़ने से पूर्व ही मैं पूर्णतः सावधान हो चूका था।
उसने पहला कदम बस में रखा तो गोया महसूस यूं हुआ कि मेरे धड़कते जिगर पे हाथ रख दिया हो, जैसे जैसे उसके कदम आगे बढ़ते जा रहे थे मेरी धड़कने तेज हुई जा रही थी......शेष वृतांत अगली पोस्ट में ।

No comments:
Post a Comment