Tuesday, 13 June 2017

यात्रा_वृतांत भाग-२

#यात्रा_वृतांत_भाग_2

#बांवरा_मन

उसने पहला कदम बस में रखा तो गोया महसूस यूं हुआ कि मेरे धड़कते जिगर पे हाथ रख दिया हो, जैसे जैसे उसके कदम आगे बढ़ते जा रहे थे मेरी धड़कने तेज हुई जा रही थी।

खैर आखिरकार मेरी तकदीर किसी चांद की चांदनी की तरह चमक उठी बिना किसी औपचारिकता के वो मेरे पास आकर बैठ चुकी थी।

मैं अपने भाग्य पर इतरा रहा था तो उधर कतार में लगे अन्य प्रतियोगियों की हसद का शिकार भी मुझे होना पड़ रहा था। खैर उनका मुझसे जलना स्वाभाविक था और उनकी यह जलन देखकर मुझे जो खुशी हासिल हो रही थी उसे शब्दों में बयां नहीं किया जा सकता।

अब तक जो मैं एक कोने में सिमटा सुकड़ा पड़ा था अचानक ही मेरा शरीर सीट पर किसी वृक्ष की बैल की भांति फैलने लगा था। अंगड़ाइयों के बहाने से हाथ ऊपर उठाकर मसल्स दिखाना, तो कभी साइड बैग में से कुछ निकाल कर खाना, कभी मोबाइल चलाने का अभिनय करना तो कभी चोरी चोरी कनखियों से उसे निहारना जिसके लिये यह सारे तकाजे किये जा रहे थे।

"कहाँ तक जायेंगी आप?" मैंने हिम्मत जुटाकर पूछ ही लिया।

"धर्मशाला" उसने बहुत संतुलित सा उत्तर दिया और उसके स्वर से लग रहा था कि उसे मुझ में या मेरी बातों में कोई दिलचस्पी नहीं है।

"लगता है आपको कोई परेशानी है, अगर आप चाहें तो मैं शायद आपकी कोई मदद कर सकता हूँ।" मुझे तो बस कैसे भी करके अपनी बात आगे बढ़ानी थी।

कौन हैं आप? जिससे मैं मदद लूँ? क्या कोई रिश्तेदार हो? सगेवाले हो मेरे? अच्छे से जानती हूँ तुम जैसे लोगों को। क्या समझते हो अकेली लड़कियां भोली भाली होती हैं तो जो चाहे अपनी बातों में उन्हें उलझा लेगा? दूर रहो और अपनी हद में रहो समझे?

खैर अब मैं समझ चूका था कि इस पर और ज्यादा ट्राय मारना मेरी इज्जत का फालूदा बनाने का सबब बन जायेगा अतः मैंने समय रहते खुद को पुनः सीट के कोने में सरका लिया था।

उसने गुस्से से खा जाने वाली निगाह से आखिरी बार मुझे घूर कर देखा और फिर अपना हैण्ड बैग निकालकर उसमे से कुछ तलाशने लगी, उसके चेहरे पर बढ़ती चिंता की लकीरों ने मुझे इस बात से आगाह तो कर दिया था कि जो चीज वो ढूंढ रही थी वो उसे नहीं मिल रही थी।

उसे शायद वो कागज का टुकड़ा चाहिये था जो उसने आते ही अपने हाथों से गिरा दिया था, वो कागज का टुकड़ा जिस पर एक एड्रेस लिखा था।

खैर वो उसे मिलना भी नहीं था, क्योंकि वो कागज का टुकड़ा जब वो मेरे पास सीट पर बैठी उस वक़्त उसके हाथ में था और उसके हाथों से किस वक़्त निकल कर गिर पड़ा इसका उसे आभास ही नहीं था। मैंने उसी वक़्त उस कागज के टुकड़े को उठा लिया था, कोई डॉक्टर येशी धोंडेन का नाम पता लिखा था उस पर।

मैंने जब उसकी ओर वह कागज का टुकड़ा बढ़ाया तो जैसे उसकी जान में जान आ गई। उसके चेहरे पर जो परेशानी के भाव थे वे उसी क्षण ही जाते रहे।

पहली बार उसने मुझसे कुछ ढंग से बात की उसने बताया कि यदि यह कागज का टुकड़ा खो जाता तो उसका जालंधर से यहां तक आना बेकार हो जाता। अब उसका मेरे प्रति बदला स्वाभाव देखकर मुझे मेरा काम बनता नजर आने लगा मुझे लगने लगा था कि अब मेरी दाल यहां गल ही जायेगी।

अब शुरू हुआ हमारा बातों का सिलसिला पहले तो बाकायदा एक छोटा सा परिचय सत्र हुआ हम दोनों के बीच फिर कुछ अनौपचारिक बातें। बातों ही बातों में बात वहां तक जा पहुंची जिसकी मैंने भी कल्पना या उम्मीद नहीं की थी। न ही मुझे इस बात का जरा भी अंदाजा था कि वो जो मुझसे अभी आधा घंटा पहले ही मिली है, मुझसे ऐसी बात भी कर जायेगी।

दरअसल उसने बताया कि....शेष वृतांत अंतिम कड़ी में।।

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